छितरी इधर उधर वो शाश्वत चमक लिये
देखी जब रेत पर बिखरी अनाम सीपियाँ
मचलता मन इन्हें बटोर रख छोड़ने को
न जाने यह हैं किसका इतिहास समेटे हुये

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13 November 2009

तो.. आज लग जाये एक शर्त ?

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आज कुछ ज़्यादा लिख कर तुम्हें परेशान नहीं करूँगा । भई, आज  तो  बाल-दिवस  है, बोले  तो  हैप्पी चिल्ड्रेन्स डे !  बोलो है ना, क्योंकि तुम्हारे स्कूलों में आज खूब गाने वाने, डाँस, फ़ैन्सी ड्रेस  वगैरह हुआ होगा ?  तुम सबने  हुल्लड़ मस्ती और चुटकुलों के चटकारे लिये होंगे । आज तो ढेर सारी शुभकामनायें मिल रहीं होंगी । अब अगर मैं अचपन जी, तुम्हें शुभकामना न भेजूँ, यह बड़ी गड़बड़ बात हो जायेगी । लेकिन  मैं  कुछ  कँज़ूस  और  थोड़ा थोड़ा  लालची  भी  हूँ ।  बूझो  कैसे  ? वह  ऎसे  कि  मुझे  अपनी शुभकामनाओं के बदले अपना मनपसँद रिटर्न-गिफ़्ट चाहिये होता है । तो..आज  लग  जाये  एक  शर्त, कि मुझे मेरा रिटर्न-गिफ़्ट तुम सब बड़े होकर ज़रूर दोगे ? जी हाँ, आपको भारत का गौरव बन कर पूरी दुनिया को दिखाना है ! तब तो आपकी वज़ह से आपके मम्मी, पापा और अचपन जी भी फ़ेमस हो जायेंगे  Untitled अगली बार मैं बताऊँगा कि, मैं सोन-पापड़ी, पतीसा क्यों नहीं खाता । एनी गेस ?
अब तुम दिमाग लगाओ, मैं तो चला.. मेरे बहुत सारे काम पेन्डिंग पड़े हैं ।
तो.. तुम सबको हैप्पी चिल्ड्रेन्स डे और अचपन जी का जय हिन्द !

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07 September 2009

पिंगपिंग की अनोखी सहेली

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हुआ यह कि एक दिन जया की शैतानियों पर मुझे प्यार आ गया, " देखो तो छटँकी कैसी हरकतें कर रही है ? " निखिल को मौज़ आ गयी, " छटँकी क्यों कहा, अँकल ?"  मैं उनको इस विषय पर शह नहीं देना चाहता था, सो टाल गया, " देखो फ़िफ़्थ में पहुँच गयी, और अभी भी इत्ती सी है !" लेकिन आज उसका जैसे दिन ही ख़राब था । जिसको कि तुम बच्चा-पार्टी  कहते हो कि, " आज तो मेरा लक ही ख़राब है । " मैंने चिढ़ाया !  यह सुनते ही परम विद्वान, महाज्ञानी चुगलखोर महाराज श्री वैभव जी तुरँत लपक पड़े,

" औः और.. और क्या, ठीक तो कहते हैं, अचपन जी । लक वक कुच्छ नहीं होता है । मम्मी दूध का गिलास लिये इसके पीछे पीछॆ घूमती रहती हैं, तब जाकर यह दूध पीती है । औः औह... उसमें से भी इत्ता सारा दूध मेरे गिलास में डाल देती है । " मैंनें अपना ढेर सारा मुँह लटका कर कहा, " यह गलत बात है, जया । इससे तो तुम इत्ती की इत्ती रह जाओगी । ताकत के किये और बढ़ने के लिये तो यह सब ज़रूरी है, न भाई ? " अब तो वैभव गुरु जैसे  मेरे सेनापति बन गये, " मेरी कुर्सी के हत्थे पर सवार होकर मेरा मुँह अपनी ओर ज़बरन खींच खींच और सारे भेद उगलने लगे,

" अचपन जी.. अचपन जी.. ऎई अचपन जी सुनिये तो... यह, यह  ग्रीन वाली सब्ज़ियाँ.. अरे, वो हरी वेजिटेबुल, हाँ यह तो वह भी नहीं खाती है, जो  एक  बार  आपने हम सब को विडियो दिखला कर बताया था ! एप्पल भी नहीं ! " कहती है कि, कम्पलान तो पीती हूँ । मैंनें उछलने का एक्सन किया, “ भाई कम्पलान तो बहुत बड़ा धोखा है । उससे कुछ भी ख़ास नहीं होता । निखिल ने कहा, जो बात आप जानते हैं, वह सरकार भी तो जानती होगी, फिर बिकता क्यों है ? मैं उनको समझाने के लिये कुछ अच्छा सोच ही रहा था कि, वैभव जी का धैर्य चुक गया । अचपन  जी, जया ने तो कल  सारा  पालक  छिपा  कर  गमले  में  फेंक  दिया  था ।  और  और  औः मुझको मारने का प्लान बना रही थी ।  बड़ी मुसीबत है, भाई .. अगर अभी जया को डाँट पिलाता हूँ, तो  इन  श्रीमान  चुगलखोर  जी  का  हौसला  बढ़ता  है । और कुछ न कहता हूँ तो जया का नुकसान हो सकता है । किसी दूसरी तरह से इन बच्चों को यह सब समझाना पड़ेगा ।

pingping-achpan एकदम से एक बात सूझी, मैंने कहा ठीक है.. तुम लोग जो मन हो करो,मेराachpan-pachpan क्या ? तुम  खुद  ही  पिंगपिंग जैसी हो जाओगी, अगर चाहो तो पैन्क्रातोवा जैसी भी बन सकती हो । निखिल महाशय अकेले ही गेंद को टप्पा खिलाने में मस्त थे, एकदम से गेंद छोड़ छाड़ कर दौड़े हुये आये, " कौन है यह पिंगपिंग.. अँकल ? और वो अभी जो एक नाम और भी ले रहे थे.. तोवा-कोवा जैसा कुछ करके, वह कौन है ? "  बता  दूँगा.. बाद में बता दूँगा । उनका ज़वाब तैयार था, " क्यों.. बाद में क्यों ? आप भूल गये तो.. आप  ही  तो  कहते हैं   कि, अपनी जी० के०   बढ़ाने   वाली  जानकारी  लेने  में  देर  नहीं करनी चाहिये.. फिर बाद में क्यों ? " आज बहुत दिनों बाद तुम फिर फँसे, अचपन ! बच्चों की दोस्ती जी का ज़ँज़ाल !

अच्छा तो पहले उस कोने वाली टेबुल से मेरा एल्बम तो उठाओ, और  सबसे  ऊपर  के  तीन पन्नों  पर लगे फोटो  देखो !  यह  फोटो  अभी  पिछले  ही वर्ष तो, यानि 16 सितम्बर 2008 को लँदन में खींचे गये थे । penkrotova-achpan

इतने देर बार जाकर जया जी का बोल फूटा, "अरे… ये कौन  हैं,  इनके फोटो क्यों खींचे गये,  अँकल ? " पिंगपिंग मँगोलिया में रहते हैं और दुनिया में सबसे कम लम्बाई के आदमी हैं । यह  सिर्फ़ 2 फ़ीट 5 इंच के हैं । निखिल  बीच  में  बोले,"  मुझे  सेन्टीमीटर  में बताइये ।" सेन्टीमीटर में 74.61 से. मी. होता है । निखिल  ने  शाम  को  फोन  करके  मुझे  बताया  कि, 74.61 से. मी. 2 फ़ीट 5.37 इंच होता है । खुश हैं कि,  मेरी  एक  गलती  उनके  हाथ  लग  ही  गयी ।

we are milestone-achpan और यह लड़की दुनिया की सबसे लम्बी टाँगों वाली औरत है । यह  रूस में  रहती  है, और  इसका  नाम है    स्वेतलाना पैनक्रातोवा  । जरा देखो, सिर्फ़ इसके टाँगों की लम्बाई ही पूरे 4 फ़ीट 4 इंच यानि 132  से.मी. है । यह सब देख सुन कर भी बच्चों को सँतोष न हुआ । जया ने मुझे फिर याद दिलाया कि, " मगर यह तो आपने बताया ही नहीं कि, इनकी फोटो क्यों खींचीं गयी है ? "

सच्ची, यह तो बताना मैं  भूल ही गया था, " उस दिन 20 सितम्बर 2008 को यह दोनों गिनीज़ बुक आफ़ वर्ल्ड रिकार्ड में अपना नाम दर्ज़ करवाने को लँदन बुलाये  गये  थे  । वैभव क्यों पीछे रहें, " तो तो इनका नाम  वहाँ  नोट  हो  गया ? " हाँ भाई, यह फोटो उसी वक्त की तो है ।

we are unique-pachpan बच्चों के चेहरे खिल उठे, एक नयी जानकारी उनके हाथ जो लग गयी थी ! लौटते हुये निखिल जी उनको समझा रहे थे, वर्ल्ड रिकार्ड का मतलब विश्व कीर्तिमान.. मतलब उनके टक्कर का कोई नहीं, समझे ?

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23 July 2009

चाहे जान भले ही जाये ट्रेंरें रें... रें

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चाहे जान भले ही जाये ट्रेंरें रें... रें, रेंट्रेंयाँ !
यह कल की बात है । यानि 22 जुलाई बुधवार
" चाहे जान भले ही जाये ट्रेंरें रें रें... " रिशि जी के यह नारा लगाने का सिलसिला लगातार कुछ देर से चल रहा था । इधर मैं मजदूरों को कल का काम समझा रहा हूँ, सो ध्यान बँट रहा था । शायद वह मेरा ध्यान खींचने के लिए ही इतने जोर से नारा लगा रहा होंगे, सो मैं बाहर निकला, बगीचे के सामने वाली खाली जमीन पर वह एक सीधी लाइन में इधर से उधर कदमताल करते हुये श्रीमान यही दोहराये जा रहे था, " इसका मान  न जाने पाये... चाहे जान भले ही जाये.. " बीच बीच में म्यूज़िक,  ट्रेंरें रें... रें !
" क्यों भाई, किसके मान के लिए जान दी जा रही है ? "  मैं पूछता हूँ । वह खुद ही से बोलते हैं, परेऽऽड थम्म ! और एक पैर पटकते हुये वहीं ठहर गये, खट से निकट की दाँयी जेब में हाथ डाला व छोटा सा एक तिरंगा हवा में लहराते हुये बोले," बताइये आज क्या है ?"
यूँ तो इन बच्चों के संग मेरी शह और मात चलती ही रहती है, पर मैं चकरा गया । वह दोहराते हैं, "आज क्या है ?" अरे आज 22 जुलाई है । " हाँ हाँ वह तो है... लेकिन आज क्या है ?" वह हवा में झंडा लहरा रहे थे और अपनी भँवें उचका कर तिरँगे की ओर इशारा किया । मैं सोचता हूँ," इसमें जरूर कोई पेंच है ? आज तुम फंस गये, अचपन बच्चे !"
आज ......आज सूर्यग्रहण था । पर उनकी मुँडी बाँयें से दाँयें घूम गयी," यह नहीं.....यह तो एक नेचुरल साइंस वाली बात है.. हम तो पूछ रहे हैं," आज क्या है ?"  अरे आज जैसा पूरा ग्रहण अब 123 वर्ष ही बाद होगा, बुद्धू । लो, इनकी मुंडी तो फिर से दाँयें बाँयें घूमने लग पड़ी,” अगर मैं बुद्धू, तो बाकी सब पागल ! बताइये भला, कोई भी इस इवेन्ट को 100-200 दिन भी याद नहीं पायेगा..... और सूर्यग्रहण, पूर्यग्रहण ! आप तो यह बताइये कि आज क्या है ? आपको हिन्ट भी तो दे रहा हूं, “ तिरंगे और उनकी भवों के बीच फिर से निशानेबाजी शुरू !

अचपन बच्चा आज तो बड़ा चक्कर है, भाई..., आज मात हो जायेगी क्या ? मैं एकदम से बोल पड़ा," अरे, आज तो साल का सबसे लंबा दिन है ।" पर उनकी गरदन तो फिर घूमने लगी, दाँयें बाँयें - बाँयें दाँयें !
" ऊँहूँ गलत्त, वह तो कबका बीत गया, 21 जून को था.. लेकिन आज क्या है ? " मैं अब घनचक्कर बन गया । मेरा जवाब भी गलत मतलब निगेटिव मार्किंग और इनका सवाल  भी वहीं का वहीं," आज क्या है ?"
मैं रूआँसा हो गया....क्योंकि उनके हाथ में लहराते तिरंगे के साथ चेहरे पर ’ लास्ट बाल.. लास्ट ओवर’ जैसा भाव  और एक ललकार, हारी ? नहीं नहीं सोचने दो। जल्दी से हारी मानिये, तो बतायें । मेरे टयूशन सर आने वाले होंगे ।
हारी...एक ? नहीं नहीं, रुको जरा सोचने दो ! हारी दो ? और... और, और्रर्रर्र,  हारी....तीन !
हाय भगवान, बच्चे से हरवा दिया । पर उन्होंने इस पर ध्यान न दिया, समय कम था । विजयी भाव में वह मास्टर साहब के अंदाज में बोले," अच्छा तो ध्यान से सुनिये, आज के डेट पर ही इसको... यानि कि इस झँडे को इंडिया का नेशनल फ्लैग.. मतलब राष्ट्रीय झँडा माना गया था । मतलब मतलब......वह खुद अटक गये । फिर निक्कर की बाँयी जेब से किसी अखबार की कटिंग निकाली और उसमें देख कर बोले," हाँ श्योर, मतलब 22 जुलाई 1947 को !"
मैं कुछ शर्मिन्दा होता, इससे पहले ही उसकी मम्मी की आवाज आयी, रिशूऊऽऽ... रिशू, तुम्हारे सर आ गये । और फौरन ही वह यह जा.. और वह जा ! चलो जान बची !
अब अगर अपनी जीत का सबूत भी दिखायेंगे, तो भी दो घंटे बाद ही आयेंगे । तब तक मैं भी जरा अपना होमवर्क कर लूं । इंटरनेट पर देखूँ क्या ? लेकिन बिजली तो है नहीं,  फिर ?
फिर अपनी ही पुरानी किताबों में देखता हूं । जगमोहन सिंह-चमनलाल की किताब भगतसिंह के दस्तावेज और जवाहर लाल नेहरू की भारत एक खोज ही मिल पायी । उन्हीं को जल्दी-जल्दी उलट पुलटा । चलो, कुछ माल-मसाला मिला तो सही !  जैसा सोचा वैसा ही हुआ, अभी रात में नाइन बजे रिशी जी खास तौर आये कि, देखें अचपन जी का हारने के बाद क्या हाल है ? मैंने उलटा उन्हीं से पूछ लिया," क्यों भई 22 जुलाई 1947 को ही अपना यह क्यों झंडा तय हुआ... और इसके पहले ? वह बकर बकर मुंह ताकने लगे, जब मैने बताया कि,

“ सात अगस्त 1906 को कोलकाता के ग्रीन पार्क में एक भारतीय ध्वज लहराया था । भारतीय ध्वज यानि कि इसपर यूनियन जैक गायब था ! इस झँडे पर उपर से नीचे की ओर पीली, लाल व हरे रंग की लंबी लंबी पटिटयां थीं । उपर की पीली पटटी पर आठ कमल बने थे।
1907 की मैडम भिकाजी कामा ने एक और झँडा फहराया जिसका आकार व रंगों की पटटी तो उपर वाले झँडे जैसी ही थीं, परन्तु उपर की पीली पटटी पर कमल के स्थान पर सात तारे बने थे । यह माना गया कि मैडम कामा आर्यसमाज वाले सोच की थीं तो उन्होंने तारों में सप्तऋषियों की कल्पना कर, उन्हें इसमें रखा होगा !
तीसरा भारतीय ध्वज 1911 कि बर्लिन में हुए साम्यवादियों के ( यह कौन लोग होते हैं, कभी बाद में बताऊँगा )  सम्मेलन में फहराया गया। यह ध्वज मैडम कामा के ध्वज की ही तरह था, बस तनिक सा बदलाव था ।
चौथा भारतीय झँडा 1917 में पंजाब में एनीबेसेंट व लोकमान्य तिलक ने फहराया । इस झँडे में पांच लाल पटिटयां थीं, और सबसे उपर वाली पटटी में सात तारे थे । इसकी खास बात यह थी किझँडे के खँभे से जुड़ने वाले हिस्से में किनारे एक छोटा सा ब्रिटिश झँडा यूनियन जैक भी बना था । और लहराने वाले हिस्से में किनारे पर आधे चाँद में एक तारा था ।
1931 में विजयवाड़ा आंध्र प्रदेश के कांग्रेस सम्मेलन में एक अनाम युवक ने एक झँडा फहराया जिसमें लाल, सफेद व हरी पटिटयां थीं । गाँधी जी को यह झंडा अच्छा लगा तो उन्होंने सफेद पटटी पर चरखा बनाने को कहा । इस अधिवेशन के अंत में चरखा वाला यही झंडा फहराया गया ।

लाल रंग को खून से , और खून को खूनी क्राँति से जोड़ने की वज़ह से धीरे-धीरे यह लाल रँग केसरिया में बदल दिया गया ! एक प्रस्ताव पारित कर इस ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज का स्थान दिया गया ।

बाद में 22 जुलाई 1947 को वरिष्ठ विचारक और विद्वान श्री पिंगली वेंकैयानंद ने वर्तमान राष्ट्रीय झँडे की अवधारणा प्रस्तुत करते हुए यह प्रस्ताव रखा कि ध्वज में चरखे के जगह पर प्रगति के प्रतीक सम्राट अशोक का धर्मचक्र रखा जाये । इसे तुरँत स्वीकार कर लिया गया, और... अब यही है अपना, विश्वविजयी तिरँगा प्यारा.. झँडा ऊँचा रहे हमारा  ! “


pingali_venkayya  तेलुगू विद्वान पिंगली वेंकैय्या ( जन्म : 2 अगस्त 1876 - 4 जुलाई 1963 मृत्यु ) वर्तमान आँध्रप्रदेश के मछलीपत्तनम के निकट भाटालपेनुम्मार में जन्में, जिन्होंने अपनी शिक्षा कोलोम्बो से पूरी की । इसके बाद वह रेलवे गार्ड के रूप में बेल्लारी में काम किया, बाद में वह लाहौर के एँग्लो-वैदिक कालेज़ में उर्दू और जापानी का अध्ययन करने गये और स्वाधीनता की लड़ाई में गाँधी जी के साथ कूद पड़े ! इन्होंने ही 22 जुलाई 1947 को वर्तमान भारतीय राष्ट्रीय ध्वज़  ’ तिरँगे ’ को यह रूप दिया था !

अब तो रिशि जी के खिसियाने की बारी थी, इस प्रकार मैं अपने होने वाले हार को जीत में बदल सका, ट्रेंरें रें... रें,   ढम्म ढम्म ढम्म, ट्रेंरें रें... रें, रेंट्रेंयाँ ! इसका मान  न जाने पाये...चाहे जान भले ही जाये.. विश्वविजयी तिरँगा मेरा

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01 July 2009

काल-कलौटी..

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" निखिल भैआ, आ गये अचपन जी ? " कुछ सुनी-सुनी सी आवाज है, मैं सतर्क होता हूँ ।

दुबारा से " निखिल भैआ, आ गये अचपन जी ? " एक बार फिर दोहराया गया । अरे, ये तो अपना वैभव है, बहुत दिन बाद इनकी आवाज़ सुन रहा हूं । " नहीं बेटा, देखो शायद आज रात तक आ जाये । " बेचारे निराश हो गये, बोले तो कुछ भी नहीं, लेकिन बड़ी अदा से अपने दोनों कंधें नीचे झुका कर झटके,और बेचारगी से हल्की बारिश से गीली हो गई अपनी कामचलताऊ क्रिकेट पिच को देखते रहे । मुझे कौतुक हुआ," क्या बोर हो रहे हो ?" ज़नाब जोधा के अकबर भाई जूनियर ऋतिक रोशन जी  ने एक लम्बाऽऽ सा आलाप लिया, " हां ऽऽऽ, हो तो रहे हैं । "

फिर खिसियाहट में पलट कर गुस्से से बोले, " .. और हाप्प भी..  हापने भी तो, " फिर ढेर सारा थूक गटक कर पूरी सावधानी बरतते हुए उल्टे अपना आरोप जड़ डाला, " आपने भी तो इत्ते दिन से कुछ भी मजा नहीं लगाया ! "

जया ने  कुछ मान से पीछे से पुकारा, " बउआ आओ चलें.. कोई फायदा थोड़े ही ना है, यह तो जबरदस्ती से हमारे मैच में थर्ड अम्पायर बन कर हमेशा से निखिल भैया को ही जीताते रहते हैं | “ ओफफोह, अपने ही चहेते बच्चे मुझसे इतने नाराज ?

इनको अभी से पिघला लो निट्ठल्ले भाई, वरना यह भी बागी हो जायेंगे । " अच्छा शाम को आना मैं तुमको कुछ नया पढ़वाउंगा और ठंडा भी पिलाऊँगा । क्या पिओगे............अमूल कूल या मैंगो फूटी ? " लगता है कुछ असर हुआ । दोनों के चेहरों के भाव बदले.." मैंगोऽऽ, अमूल.. आँऽऽ नहीं, ठहरिये बताते हैं, " आच्छा तो अमूल...अमूल कूल ! "

शाम को 5.30 बजे मेरे लौटते ही हाजिर दोनों जन, अब क्या करें ?

अच्छा बताओ, पानी नहीं बरस रहा है, गरमी बढ़ती जा रही है, तुम बच्चों ने पानी बरसाने के लिए क्या किया ? " आहा हा हाय रे, अरे आज सुबह ही तो बलछा है ", वैभव जी को मुझे क्लीन बोल्ड करने का मौका मिल गया जैसे !

जया ने उनके सिर पर हलकी चपत लगायी," हट पागल, कितना कम तो पानी बरसा है । " विकेट रोकने के अंदाज में.., " लेकिन बरसा तो है ना पागल ", पूरी ताकत से  वैभव जी नीचे तक झुक कर चिल्लाये, मानो अपील कर रहे हों ।

फिर तो शुरू हो गया, तुम पागल, तुम पागल, तुम पगलेट, तुम महापगलेट तुम सबसे बड़े पग्गलदास, तुम उससे भी बडी पगलेट इंडिया की सबसे बड़ी पगलेट पागल महापागल पूरे वर्ल्ड की सबसे बड़ी, पग्गलदास ! लगता है, अब कुश्ती होने को ही है । वह एक दूसरे पर लपकते, इससे पहले ही मैने उलझा लिया !

देखो पहले जब पानी नहीं बरसता था तो गांव के बच्चे झुंड बना कर हर दरवाजे पर जाते थे, खूब शोर-शराबा करते हुए गाते थे जब तक कि उनके उपर पानी न डाल दिया जाये ।

वैभव जी के आंखें बाहर को आकर उनके टी-शर्ट की पाकेट तक झूल गयी । पहले तो उन्होंनें अपनी शँका का निवारण किया.. "  गांव के मतलब विलेज के ? " फिर मुझे खारिज करते हुए बोले, “ हट झूठ झूठ में हमको पागल बना रहे हैं ।”

पर जया थोड़ा सतर्क हुई, " लेकिन अचपन जी इससे क्या होगा ? " मैंनें बात आगे बढ़ाई, " होगा यह कि बच्चे भगवान का रूप होते हैं न, तो जब भगवान उनको परेशान देखते है, तो पानी बरसाते हैं । वैभव तो जैसे चिढ़े हुए है, " धत्त, साँइटिस्ट बरसाते हैं, भगवान कहां पानी बरसाता है ? " देखिये तो वैभव जी फिर गुगली फेंक पड़े और मेरे आउट होने की यानि मेरा ज़वाब जानने की प्रतीक्षा भी न की, और वह पलट पड़े ।

जया डर गई, न जाने काहे से, भगवान के नाराज़ होने से.. या फिर अमूल कूल हाथ से जाते रहने की सँभावना से ? उसने एक चीख लगायी, " बऊआ रुको, भगवान के लिये ऎसा नहीं बोलते । " वैभव थम गये, और वहीं से अपनी हाँक लगायी, " मैंनें.. मैंनें भगवान जी की इन्सल्ट नहीं की, अचपन जी ही तो हमको पागल बना रहे हैं । " उनके नथुने फ़ड़क रहे थे, " बच्चे भगवान होते हैं.. भगवान होते है, तो भला भगवान की पिटाई होती है ? "

लेकिन जया किसी सोच में डूबी हुई थी । लेकिन अचपन जी हमारे मम्मी पापा हमको ऐसा करने ही न देंगे । और.. और तो और कोई पानी भी नहीं डालेगा, बड़ी मुसीबत से तो हमारे लोग का पीने का ही पानी आता है । "

जया समझदार होती जा रही है, वह कुछ आगे जानना चाहती थीं, " अचपन जी इस गेम को क्या कहते है ? " मेरा दिल बैठ गया कि इनको इसे एक टोटका मात्र बतायें या नहीं, अग़र पूछ लिया टोटका क्या होता है, तो ? फिर तो मैंनें ज़ल्दी से बात खत्म कर देनी चाही, " काल-कलौटी.. यह देखो फोटो ! "

bail-piyase kal-kalauti

यह.. यह सच्ची के हैं ? वह उत्तेजित हो गयी, यहऽऽ, यह यह्ह, फोटो हमको कापी करके दे दीजिये । मुझे लगा कि उसकी नजर अमूल कूल के पैकेट पर भी थी ।
ठीक है दे दूंगा, यह वैभव का पैक भी लेते जाओ।
वह जाते जाते एकदम से ठहर गयी," अचपन जी, आपने यह तो बताया नहीं कि यह बच्चे " बरसो से मेघा रे, बरसो रे मेघा मेघा बरसो, बरसो रे मेघा बरसो.. धिन्ना रे धिन्ना रे " गाते थे, या और कुछ और ? " वह भी थोड़ा सा गुनगुना कर अपने को जैसे तौलने लगी ।

वह तो शायद यही गाते थे कि..
काले मेघा पानी दे
गगरी छूछी, बैल पियासे
गौ-गौवन को पानी दे
काले मेघा पानी दे, पानी दे गुड़ धानी दे
काले मेघा पानी दे,काले मेघा पानी दे,

बरसे जा.. बरसाये जा, बदरा झड़ी लगाये जा
बरसो राम धड़ाके से, तुम्बी भर दो आटे से

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03 January 2009

पहली डिज़िटल घड़ी

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आज 3 जनवरी है... कोई नई बात... नहीं ?

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रुको जरा, मैं बताता हूँ । यह जो तुम अपने ड्राइंग-रूम में टँगी हुई घड़ी देख रहे हो.. और तन्मय जी, अपने हाथ पर बाँधें घूम रहे हैं.... यह डिज़िटल घड़ी आज के ही दिन लांच हुई  थी ! यह जानकारी मुझको रिशी जी ने अभी अभी दी है ! मैंनें तो सोचा, कि यह हाँक रहें हैं.. फिर नेट पर देखा तो यह सच ही बोल रहे हैं ! हुआ यह कि..

  
पुराने दौर में मैनुयल घड़ी को चालू रखने व सही समय देखने के लिये चौबीस घंटे में एक बार चाभी भरना बहुत ही ज़रूरी रहता था । इन घड़ियों की सबसे बड़ी प्रोब्लेम यह थी कि तुम एक बार भी चाभी भरना भूले नहीं कि तुम्हारा टाइम मैनेज़मेन्ट गड़बड़ाना तय !

इस समस्या का समाधान किया हैमिल्टन इलेक्ट्रिक आब्सोलेट नाम के कम्पनी ने । इसी कम्पनी ने दुनिया की पहली इलेक्ट्रानिक घड़ी लांच की थी । पता है.. बैटरी से चलने वाली इस घड़ी को बनाने में पूरे दस साल लग गये थे । इसे बनाने के प्रयास 1946  में शुरू कर दिया गया था, पर यह लांच हो पायी 3 जनवरी 1957  को । हैमिल्टन की यह घड़ी आधुनिकता की परिचायक मानी गयी ! लोग इसके पीछे पागल हो उठे । इसका केस भी काफी शानदार था, जिसने लोगों को बहुत आकर्षित किया । रिशी जी  ऎसी जानकारियाँ ला लाकर तुमको देते रहेंगे, इसलिये सारा का सारा थैंक-यू उनको ही देना !

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14 November 2008

亜 … ये लोग बम क्यों फुटाते हैं ?

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इन दिनों इधर आना ही नहीं हुआ, कुछ काम भी था… और फिर तुम बच्चों का एक नया ग्रुप बन गया है, तो मैं भी डिस्टर्ब नहीं करता ! तुमलोग भी कभी कभी कुछ ऎसा पूछ लेते हो, कि मुझसे ज़वाब देते नहीं बनता, पर करें क्या.. तन्मय जी भी गुस्सा हो जाते हैं , लड़ने लगते हैं.. कहते हैं कि, आप बड़े लोग भी तो झगड़ा करते हो.. तो फिर सिर्फ़ बच्चों को ही क्यों मना करते हो ? अब क्या बतायें.. इन शिरीमान जी को.. ईषिता भी बस ठीक ही है.. अचपन बचपन - ये लोग बम क्यों फुटाते हैं neverअब कोई बताये जरा,कि इसमें मैं क्या बोलूँ या फिर क्या बोलता ?                    ever achpan for bomb kyon करने का प्लान बन रहा है ?” इस बार रिशी जी दौड़कर आये, “ वैभव रो रहा है.. और हम सब उसको चुप  करा रहे हैं ।” मैं थोड़ा बन कर बोलता हूँ, “अले.. मेले फुच्चु जी फुच्च फुच्च कल्के लोलैएँ ऎं, क्यों भाई ?”  फुच्चु जी   का गाल और फूल गया .. नाक से सुर्रसुर्र भौं भौं आवाज़ें आनी और भी बढ़ गयीं । मुझको जैसे वहगुस्से से घूरते हुये खड़े रहे, पर बोले कुछ नहीं … टप्प ! टप्प से रिशी महाराज फिर टपक पड़े , “इसके पापा कल शाम को मुंबई चले गये, अब तक कोई फोन भी नहीं किया, इनकी बुआजी हास्पिटल में एडमिट हैं… उनका आपरेशन होगा.. कल 2 बजे दोपहर में फूफाजी का मेसेज़ आया था… अंकल और आँटी दोनों जन गये हैं ।” फुच्चु अपनी बड़ी बड़ी लाल डबडब आँखों से मुझे देखता रहा फिर अचानक ओँऊँ आँऊँ करके रो पड़ा, “ गिट्टू बुआ ( सूक्ष्म डीलडौल Micro Size की वजह से यह नाम पड़ा होगा, शायद ! ) गिट्टू बुआः तो सब्ज़ी लेने रोज मार्केत जाती थींहः, किछी ने बम फुटा दियाः, वह बोहोत बिमाढ़ हो गयीं .. फेर छबलोग उनको होश्पीतल ले गयेहः.. हः हाँहुँआँ आँअँ आँअँ..आँ ” अब तक रिशी महोदय, अपने दोनों हाथ कमर पर रखे एक अफ़सर की तरह सभी का ज़ायज़ा ले रहे थे.फिर सीधे मेरी ओर देख कर दाँत पीसते हुये दोनों हाथ झटक कर बोले, अचपनजी,  इस तरह से यह लोग बम क्यों फुटाते हैं ? “क्यों बम फुटा रहे घैं

HAPPY  CHILDREN’s DAY !  11  यह लो, मुझे तो याद ही न रहा था कि आज का दिन बाल दिवस ( 14 th November ) के रूप में मनाया जाता है…. तो भई सभी बच्चों व पढ़ने वालो को मेरा हैप्पी चिल्ड्रेन्स डे !  वैसे तो मेरे लिये सभी दिन चिल्ड्रेन्स डे होता है, अब भला तुम लोगों के लिये तो मम्मी पापा, बाबा दादी कोई अलग से किसी डे को मनायें.. यह बात तो गड़बड़ लगती है, न ! हाँ, आज हमारे ग्रुप में एक नये मेम्बर भी शामिल हुये हैं, उनका कहना है, कि हैप्पी चिल्ड्रेन्स डे  मनाया जाय  … इनसे मिलिये यह हैं, गपोलू जी,  आप के ग्रुप लीडर...

 

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03 August 2008

आप गायब कहाँ हो गये थे

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अरे भाई क्या बतायें ? कल तन्मय जी की मम्मी आयीं थीं, तन्मय को 6 दिन से बुखार आ रहा है, कल सुबह तो उसका फ़ीवर इतना तेज हो गया था कि वह जैसे बेहोश सा हो गया । आँख बन्द किये किये बड़बड़ाये जा रहा था कि, “ अचपन जी को फोन करिये.. अचपन जी अब क्यों नहीं आते.. अचपन जी मुझसे नाराज़ हैं… आई एम सारी मम्मी.. उनसे मेरा सारी बोलो.. नहीं नहीं, अभी बोलो..”और भी न जाने क्या क्या ?  अच्छा  इतने जन में से कोई भी बता दे कि.. भले ही तन्मय जी मेरा नोटिस न लेते रहे हों, लेकिन क्या मैं नाराज़ हूँ ? नहीं हूँ ! बच्चों से तो नाराज़ मैं होता ही नहीं ।  सिर्फ़ इसीलिये कि वो बच्चे हैं ! क्योंकि वो बच्चे हैं बस ! किसी का बचपन फिर से आता है, क्या ? अब.. कुछ ग़लत करोगे तब मैं कहूँगा ही कि ऎसा मत करो ।

अभी उसी दिन की तो बात हैं, अरे वही ऽ ऽ मेंढ़क वाली, तो बताओ मैंने क्या कहा था । तुम सब लोग तो थे, वहाँ ? और आज भी डाँट नहीं रहा हूँ, लेकिन भई समझाऊँगा तो ज़रूर ! अब देखोकि ऎंवेईं कोई उल्टा सीधा खाकर अपने को बीमार कर लेगा, तो तुमलोगों में से किसके किसके मम्मी-पापा खुश होंगे ? किसीके भी नहीं, फिर ? इस रेनी सीज़न में चाट के ठेले पर मज़े लेंगे, तो फिर इंज़ेक्शन और ब्लड-टेस्ट के भी तो मज़े लेने पड़ सकते हैं ! छोड़ो, हमें क्या.. ख़ुद ही अकल आ ज़ायेगी ।

आज कुछ क्या बहुत ठीक हैं । जब उन्होंने खाया तभी उनके गोल्डेन रिट्रीवर ने भी खाना खाया । ज़ानवर है, तब भी इतनी फ़ीलिंग्स हैं । वो मारते रहते हैं, उसको..आज़ तन्मय जी के लिये एक विडीयो फाइल लगायी है, ज़रा उनको भी दिखला देना ।

 

और बच्चों, सभीजन ध्यान दे रहे हैं कि नहीं ? जिसने भी कोई पेट बोले तो घरेलू ज़ानवर पाल रखा है, एनिथिंग…. डोग्गी, बिल्ली, माइस, गिनी-पिग प्लीज़ प्लीज़ उनको समझने की कोशिश किया करो । अब हर ज़ानवर तो इन बिल्ली रानी जैसा नहीं होता न, कि टीवी बन्द करदे ! उनको ध्यान से देखो कि वह बिना बोले भी कितना कुछ तुमसे बोलते हैं । ओ.के. चलें !

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26 June 2008

सचिन के सैकड़े

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थोड़ी मस्ती हो जाये ? ठीक, तो सचिन बास कैसे रहेंगे आज के लिये ? एग्रीड ? लेकिन मुझे तो क्लिनिक जाने की देर हो रही है । आज चलो एक छोटा सा मज़ा करते हैं, टूनडून से । थोड़ा कोशिश करोगे तो तुम भी कर पाओगे । देखो, है ना मज़ेदार !

                              

देखने में यदि कोई अड़चन हो तो, मैक्रोमीडिया फ़्लैशप्लेयर डाउनलोड करके इंस्टाल कर लेना । अब तो ठीक है ! चाहो तो तुम भी बना सकते हो, लेकिन भाई पहले अपना होमवर्क ख़तम कर लो, खाना खा लो उसके बाद ही, ओक्के ? आल द बेस्ट !

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21 June 2008

यह दिल क्यों माँगे मोर ?

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हद हो गयी, मैंने बोला नहीं कि सभी जन समझ गये कि बात कोल्ड ड्रिंक की हो रही है ! तुमलोग तो बहुत ही इन्टेलिज़ेंट हो । चलो अच्छा है, मुझको अपनी बात ज़्यादा समझाना नहीं पड़ेगा । तुम सब को तो कल शाम की बिट्टू की हरकत याद है ना । उसने मुझे हराने की कितनी कोशिश की थी ।  अचपन जी बच्चों से बहुत प्यार करते हैं, तो यह कोई थोड़ी ना है कि हर बात मान लेंगे । तुम लोगों ने कहा कि बरसात में दो दिनों से घर में बंद बैठे है, हमने कहा चलो घुमा लाते हैं । ये तो ठीक था, लेकिन तन्मय जी ने बिट्टू को कुछ सिखा दिया और सब लोग फ़ुस्स फ़ुस्स करते एक दूसरे को, मेरी तरफ धकेलने लगे । मैं भी बच्चूजी सब समझता था, फिर बिट्टू ने फ़रमाईश की, " तन्नू भैय्या कोल्ड ड्रिंक पिलाने को कह रहे हैं, पिलाइये ना अभी । पिलाइये ना अचपन अंकल, पी ..लाई..ऎ, अंकल प्लीज़ पी ..लाई..ऎ । बिट्टू तो जैसे पीछे ही पड़ गयी । मैंने जैसे कुछ सुना ही नहीं, बस आगे एक कोल्ड ड्रिंक की दुकान के आगे बिट्टूजी के पैरों में ब्रेक लग गया, ऊँहुँ ऊँ, पिलाइये पिल्ल्लाः दिज़्जियाए ।

                                                      कृपया ज़वाब दीजिये pop-1733_4 कृपया ज़वाब दीजिये

यह तन्मय हमेशा कुछ न कुछ मुसीबत खड़ी करता है । मैंने बिट्टू को समझाया, "अभी तो घूमने आये हैं, पैसे मेरे पास तो है नहीं, कल पिलायेंगे श्योर !" और भईय्या, वह बीच मार्केट में ही चिल्लाने लगी. "बड़े होकर भी झूठ बोलते हैं, मैंने देखा है आपने अपना वैलेट उस्स वाली ज़ेब में रख्खा था ।" लग रहा था कि मैं हार जाऊँगा, मेरे बड़े होकर भी झूठ बोलने की चोरी छोटी बच्ची ने खोल दी, अब्ब ! " देखो कोल्ड ड्रिंक गंदी चीज होती है, आगे तुमको कुछ और पिलाऊँगा ।"  नहिंनहिंनहिं नहीं, अभी इछि वखत पिलाइये, गंदी चीज है तो बिक कैसे रही है, पुलिस इनको ज़ेल में क्यों नहीं बंद करती ? " बिट्टू बेटा, दाँत सड़ जाते हैं, गल जाते हैं, बात माना करो ।" मैंनें फिर समझाने की कोशिश की । बिट्टूजी सहम गयीं, लेकिन दुष्ट तन्मय.. बोला," अभी कुछ दिनों में तो इसके ये वाले दाँत टूट ही जाने हैं, फिर नये दाँत भी आ ही जायेंगे ।" पाज़ी कहीं का, वकील बनेगा । मैंनें डाँटना चाहा, लेकिन सामने एक साइबरकैफ़े दिख गया और तीनोंजन को वहाँ ले जाकर कुछ दिखलाया, तुम भी देखो

नकली रंगध्लाईतैयारी

बोतलों की तैयारीभराईबुलबुले

गैसढक्कनसील

मिस्टर तन्मय कल ही मुझसे भिड़े थे कि नेट पर सभी जानकारी अप टू डेट और सच्ची होती है, वह तो इधर उधर झाँकने लगे । अच्छी बिट्टू, समझदार बिट्टू ने धीरे से कहा, "ठीक है, छोड़ दीजिये फिर!" बेचारी बिट्टूजी को तन्मय ने ऎसा बहकाया कि वह आज नकली वाली कोल्ड ड्रिंक पी ही लेती । जानते हो, यह शैतान बिना किसी टेस्ट के ऎसे ही देख लेते हैं कि पकड़े तो नहीं जायेंगे ?  कुछ असली वाली ड्रिंक की बोतलों से अपने बनाये वाले का रंग मिला कर देख लिया,और छुट्टी राम छुट्टी!

                                     

                                               असली नकली

क्या अभी भी कोई कह रहा है कि, " यह दिल माँगे मोर ? " आमिर हों या शाहरुख, तुम तो इस चक्कर में पड़ना भी नहीं ! बिट्टूजी ने मज़े से कुल्फ़ी खायी और अमूलकूल वाला मिल्क बादाम पिया, और कोल्ड ड्रिंक वाले को बोला, ' जै राम जी की ! '

  

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15 June 2008

मैंने एक अज़ीब सपना देखा

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जब तक तुम लोग कुछ लिखने का मन पक्का करो, मैं तुम सबसे, खास तौर पर तन्मय से एक सपना शेयर करना चाहता हूँ। कल की रात तन्मय के बारे में सोचते सोचते सोया था, हो सकता है कि यह सपना इसी वजह से आया हो । तुमको जानकर पता नहीं कैसा लगेगा कि मैं  इतने कम.. इतने कम.. इतने कम सपने देखता हूँ कि मेरे पास सपनों के बारे में बताने को कुछ खास है ही नहीं । आजकल यहाँ बरसात हो रही है, तो मेंढक भी मेरे लान और पीछे वाले बाग में फुदकने लगे हैं । यह कोई नयी बात थोड़ी ना है ? लेकिन तन्मय जी पूरे दिन इन मेंढकों को परेशान कर के मज़ा लेते रहते हैं, पता नहीं क्यों ?

                                           तन्मय का एक बेचारा शिकार - अचपन पचपन

कभी तो कंकड़ से मार मार कर उसे उछलने को मज़बूर करते हैं, कभी पकड़ कर रस्सी से बाँध कर उसे हवा झुलाते हुये घूमते हैं, जैसे कि कोई बहुत बड़ा शेर मारा हो । बेचारा मेंढक कभी डर से, कभी दर्द से और कभी इधर उधर ठोकर लगते रहने से मर भी जाता है । भाई, मुझको बहुत बहुत खराब लगता है । मैंने तन्मय से कहा भी कि यह तो तुम्हारा कुछ भी नहीं बिगाड़ता, उलटे ठीक समय पर आकर बरसाती कीड़ों को चट कर जाता है । अगर मेंढक जैसे जानवर न हों, तो पूरी दुनिया में इतने कीड़े हों जायें कि तुम सोच भी नहीं सकते, करोड़ों करोड़ के करोड़ करोड़ !  एक करोड़ याने कि 1,00,00,000,.. बाप रे, मेरा तो दिमाग ही चकरा रहा है । अगर एक भी कीड़ा कपड़ों पर बैठ जाता है तो जान निकल जाती है, और यहाँ इतने सारे करोड़ कीड़े ! लेकिन मेंढक, छिपकिली वगैरह इनको खाकर हम लोगों को ज़िन्दा रहने का मौका देती हैं । तन्मय जी की सारी बहादुरी इन पर ही निकलती है, जो अपने आपको बचा भी नहीं सकते । मना करो तो तन्मय सुनते ही नहीं, पूअर चैप !

मैंने सोचा कि यह सब बातें अचपन पचपन के ब्लाग पर डाल दूँगा, तब तन्मय जी समझेंगे । एक बात तो है कि तन्मय न समझें तो क्या हुआ ? तुम लोग तो समझ ही जाओगे और फिर तन्मय से कुट्टी कर लोगे तो देखना अपनी सारी नक्शेबाजी  भूल जायेंगे,मिस्टर जी ! बस यही सब सोचते सोचते सो गया कि सपने में देखा कि बहुत सारे जानवरों के देश में घूम रहा हूँ, और वहाँ के मज़े ले रहा हूँ ।तुमलोगों को तो बाहर ही रोक दिया गया मिस्टर तन्मय की वज़ह से ! इनसे कुट्टी कर ही लो ।

वहाँ मैंने देखा कि सभी जानवर जो हैं, वह आदमी लोगों से बदला निकाल रहे हैं । नहीं नहीं, आदमियों को सता नहीं रहे हैं । बस अपना अपना गुस्सा निकाल रहे हैं । यही तो बात है...कि जानवर अपने काम से काम रखते हैं, वह आदमियों का तो कोई नुकसान ही नहीं करते । वह तो डर के मारे या तंग किये जाने पर ही कुछ करते हैं । हमीं लोग दुष्ट शैतान हैं, वह नहीं ।

उनका गुस्सा निकालने का तरीका देख कर मुझे तो हँसी ही आ गयी । एक ज़ेब्रा अपनी क्रासिंग बनाये ठाठ से सड़क के इधर से उधर जा रहा है, सूअर आदमी का ही पिग्गी बैंक बनाये हुये हैं । असली माउस आदमी को माउस बना कर मज़ा ले रहा है...

 अब बारी है ज़ेब्रा जी की - अचपन पचपन

तुम्हारा पिग्गी बैंक तो इनका ..ही ही ही -अचपन पचपन

और इन चूहे महाराज को देखो, हँसी तो मुझे भी आयी लेकिन वह अपने छोटे कद की वजह से माउस नाम से नाराज़ थे

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क्या ख़्याल है ? तन्मय जी जैसे बच्चों पर इन सबका कुछ असर पड़ेगा, कि नहीं ? देखो, मुझको तो 99 % उम्मीद है कि पड़ेगा ।

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तो क्या हुआ ? तुम भी ट्राई करो, ऎसे फ़ालतू झगड़ना और मज़े लेना ठीक है, क्या ?

चलिये छोड़िये यह सब, समझदारी से काम करिये । बस जुट जाइये, आप भी अच्छा लिख सकते हैं ।